भारत महिलाओं को सशक्त किये बिना आगे नही बढ़ सकता

भारत

(लेखक- एड. आराधना भार्गव )

भारत की जनसंख्या में महिलाओं की हिस्सेदारी 48.5 प्रतिशत है। भारत में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने अपनी सरकार बनने पर संसद में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा किया है। ओडिशा में बीजूु जनता दल लोकसभा चुनाव में 33 प्रतिशत सीटों पर महिलाओं को टिकिट देगें, वही त्रिणमूल कांगे्रस ने 41 प्रतिशत सीटो पर महिला उम्मीद्वारों की सूची जारी की है।

वामपंथी एवं समाजवादियों से उम्मीद है कि वे 50 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं को लोकसभा में देंगे। भारत में निचले सदन में 12.6 प्रतिशत महिलाऐं हैं, संसद में महिलाओं की कुल संख्या वैश्विक औसत का आधा है, संसद में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व दुनिया में चिंता का विषय है और भारत की स्थिति बहुत खराब है।

अगर हम देखें नेपाल में 32.7, अफगानिस्तान में 27.5, ईराक में 25.2, अमेरिका में 23.5, पकिस्तान में 20.2, साउदी अरब में 19.9, और भारत में 12.6 प्रतिशत महिलाऐं है। भारत की 543 सीटो में से 66 महिलाऐं संासद में है, संसद के निचले सदन में महिला प्रतिनिधियों वाले 193 देशों की सूची में भारत 149 वें स्थान पर है। पकिस्तान भारत से 48 पायदान ऊपर है।

हमारे देश में लड़कियों के लिये पहला स्कूल 1848 में खुला, जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ उस समय मात्र 8 प्रतिशत महिलाऐं साक्षर थी आज आंकड़ा बढ़कर 65 प्रतिशत हो गया है। जिस दुनिया में शिक्षा के दरवाजे लड़कियों के लिए बन्द रहे हों, उनका काम सिर्फ चूल्हा, चैका और बच्चे पैदा करना रहा हो वहाँ बराबरी आने में वक्त तो लगेगा। आज भारत देश की बेडियाँ देश की जीडीपी में अपना 43 प्रतिशत योगदान दे रही है, यह बहुत बडी उपलब्धी है। यह जानते समझते हुए भी कि उनके साथ घर, समाज और देश में दोयम दर्जे का व्यवाहार किया जाता है।

भारत में महिलाओं को पुरूषों के मुकाबले 19 प्रतिशत कम वेतन मिलता है, महिला को 196.3 प्रतिशत और पुरूष को 242.49 प्रतिशत वेतन मिलता है यह बात मास्टर सेलरी इन्डेक्स के अभी हुए सर्वे से सामने आया है। पिछले साल वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम की रिपोर्ट कहती है कि पूरी दुनिया में औरतों को मर्दो के मुकाबले 43 प्रतिशत कम पैसे मिलते है।

विषम परिस्थितियों में भी महिलाओं ने देश एवं दुनिया को यह संदेश दिया है कि वे दुनिया का हर काम विशेष कौशल एवं चतुराई के साथ कर सकती है, ऐसा कोई काम नही है जो महिलाऐं नही कर सकती, उसके बावजूद भी संसद में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व का एक ही कारण समझ में आता है वह है पितृसत्ता, हमारी सरकारें आज भी पितृसत्ता से उभर नही पाई है।

संसद में सांसद के वेतन भत्ते बढ़ोतरी पर देश को पता भी नही चलता और बिल पारित हो जाता है, लेकिन महिला आरक्षण की बात आते ही लोकसभा में हंगामा शुरू हो जाता है। संसद और विधान सभा में महिलाओं के लिए आरक्षण न होना, महिलाओं को टिकिट देने के लिए राजनैतिक दलों के बीच इच्छाशक्ति न होना, महिलाओं के बीच चुनावी राजनीति के बारे में जागरूकता की कमी और परिवार का समर्थन न मिल पाना भी बड़ा कारण है।

पितृसत्ता के चलते महिलाओं को यह कहकर भी डराया जाता है कि राजनीति गंदी चीज है राजनीति में महिलाओं को नही आना चाहिए, राजनीति करने वाली महिलाऐं अच्छी नही होती इस तरह के जुमले आये दिन समाज में सुनने के लिये मिलते है।

देश के हर क्षेत्र में महिलाओं ने अपना परचम फैलाया है और आने वाले समय में राजनीति में भी वे अपना परचम फैलाऐंगी, देश के कर्णधारों से निवेदन है कि लोकसभा में अपने वादे के मुताबिक महिलाओं को टिकिट देकर संसद में पहुँचाकर उनके हुनर को राजनीति में देखने का अवसर प्रदान करेंगे, आनेवाला वक्त महिलाओं और देश के लिए और सुन्दर होगा।